महाभारत की कहानी: शुरू से अंत तक, संक्षेप में

भीष्म की प्रतिज्ञा से स्वर्गारोहण तक पूरी महाभारत की कहानी हिंदी में, सही क्रम में: लाक्षागृह, द्यूत, वनवास, गीता, 18 दिन का युद्ध और उसके बाद।

महाभारत की कहानी हस्तिनापुर के कुरु वंश के दो परिवारों, पांडवों और कौरवों, के बीच राज्य के अधिकार की कहानी है। दुर्योधन छल से पांडवों का राज्य जुए में जीत लेता है, पांडव 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास काटते हैं, श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव ठुकरा दिया जाता है, और कुरुक्षेत्र में 18 दिन के युद्ध के बाद पांडव जीतते हैं। इसी युद्ध के पहले दिन श्रीकृष्ण अर्जुन को भगवद गीता का उपदेश देते हैं।

राजमहल में सिंहासन पर बैठे वृद्ध नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र, और उनके पास हाथ जोड़े खड़े संजय

महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। इसमें 18 पर्व हैं, और कथा के भीतर यह कथा व्यास के शिष्य वैशम्पायन राजा जनमेजय को सुनाते हैं। नीचे पूरी महाभारत की कहानी संक्षेप में, सही क्रम में दी गई है।

महाभारत की कहानी शुरू से: शांतनु, गंगा और भीष्म प्रतिज्ञा

हस्तिनापुर के राजा शांतनु ने गंगा से विवाह किया, इस शर्त पर कि वे उनके किसी काम पर प्रश्न नहीं करेंगे। गंगा ने अपने सात नवजात पुत्रों को नदी में बहा दिया। आठवें पुत्र के समय शांतनु ने उन्हें रोक दिया, तो गंगा उस पुत्र को लेकर चली गईं और बरसों बाद उसे एक महान योद्धा बनाकर लौटाया। यही थे देवव्रत।

बाद में शांतनु मछुआरों के मुखिया की पुत्री सत्यवती पर मोहित हुए। सत्यवती के पिता की शर्त थी कि राजा उसी का पुत्र बने। पिता की खुशी के लिए देवव्रत ने राजगद्दी छोड़ दी, और यह भी प्रतिज्ञा ली कि वे जीवन भर विवाह नहीं करेंगे, ताकि उनकी संतान भी कभी दावा न करे। इस कठोर प्रतिज्ञा के कारण वे भीष्म कहलाए, और शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया।

धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर

सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य निःसंतान मर गए। तब सत्यवती के कहने पर उनके बड़े पुत्र वेदव्यास से विचित्रवीर्य की रानियों और एक दासी को तीन पुत्र हुए: जन्म से नेत्रहीन धृतराष्ट्र, पीले रंग के पांडु और ज्ञानी विदुर।

धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए राजा पांडु बने। धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ, जिन्होंने पति की तरह जीने के लिए अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। गांधारी के सौ पुत्र हुए, कौरव, जिनमें सबसे बड़ा था दुर्योधन।

पांडव और कौरव का जन्म

पांडु की दो रानियाँ थीं, कुंती और माद्री। हिरण के रूप में विहार कर रहे ऋषि किंदम को अनजाने में बाण मारने पर पांडु को शाप मिला कि पत्नी के पास जाते ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। कुंती को ऋषि दुर्वासा से एक मंत्र मिला था, जिससे वे किसी भी देवता को बुला सकती थीं। इसी से धर्मराज से युधिष्ठिर, वायु देव से भीम और इंद्र से अर्जुन का जन्म हुआ। माद्री को अश्विनी कुमारों से नकुल और सहदेव हुए। ये पाँचों पांडव कहलाए।

कुंती ने विवाह से पहले, मंत्र परखने के लिए सूर्य को बुलाया था और उनसे कर्ण का जन्म हुआ था। लोकलाज से कुंती ने उस बालक को नदी में बहा दिया। उसे सारथी अधिरथ और राधा ने पाला, इसलिए वह राधेय और सूतपुत्र कहलाया।

पांडु की मृत्यु के बाद कुंती पाँचों पुत्रों को लेकर हस्तिनापुर लौटीं। वहाँ पांडव और कौरव साथ पले, और दोनों ने द्रोणाचार्य से शस्त्र विद्या सीखी। अर्जुन धनुर्विद्या में सबसे आगे निकले। एक प्रदर्शन में कर्ण ने अर्जुन को चुनौती दी, और जब उसके कुल पर प्रश्न उठा, दुर्योधन ने उसे अंग देश का राजा बना दिया। यहीं से कर्ण और दुर्योधन की अटूट मित्रता शुरू हुई।

लाक्षागृह: पांडवों को जलाने का षड्यंत्र

युधिष्ठिर युवराज बने तो दुर्योधन की ईर्ष्या बढ़ गई। उसने वारणावत में लाख और दूसरी जल्दी जलने वाली चीज़ों से एक महल बनवाया, लाक्षागृह, और पांडवों को कुंती के साथ वहाँ भेज दिया। विदुर ने पहले ही संकेत में चेतावनी दे दी थी और एक सुरंग खुदवा दी। जिस रात आग लगी, पांडव सुरंग से निकल गए। सबने समझा कि पांडव जल मरे।

छिपकर रहते हुए भीम ने राक्षसी हिडिंबा से विवाह किया, जिनसे घटोत्कच का जन्म हुआ, और एकचक्रा नगरी को बकासुर से मुक्त कराया।

द्रौपदी स्वयंवर

पांचाल के राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर रखा। शर्त थी कि एक भारी धनुष चढ़ाकर ऊपर घूमते यंत्र के पार लक्ष्य को भेदना है (लोकप्रिय कथाओं में नीचे पानी में मछली की परछाईं देखकर उसकी आँख भेदनी थी)। बड़े-बड़े राजा असफल रहे। ब्राह्मण के वेश में आए अर्जुन ने लक्ष्य भेद दिया।

घर लौटकर पांडवों ने कुंती से कहा, "देखो माँ, हम क्या लाए हैं।" बिना देखे कुंती बोलीं, "जो लाए हो, पाँचों भाई मिलकर बाँट लो।" माँ के वचन की मर्यादा रखने के लिए द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी बनीं। इसी स्वयंवर में पांडवों की पहली भेंट श्रीकृष्ण से हुई।

इंद्रप्रस्थ और राजसूय यज्ञ

पांडवों के जीवित होने का पता चला तो धृतराष्ट्र ने राज्य का आधा हिस्सा, बंजर खांडवप्रस्थ, उन्हें दे दिया। पांडवों ने वहाँ इंद्रप्रस्थ बसाया, और मय दानव ने उनके लिए अद्भुत मय सभा बनाई, जहाँ पानी फर्श जैसा और फर्श पानी जैसा दिखता था।

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। मय सभा में दुर्योधन फर्श समझकर पानी में गिर पड़ा, और उसकी हँसी उड़ाई गई। अपमान और पांडवों के वैभव ने उसकी ईर्ष्या को आग बना दिया।

द्यूत क्रीड़ा और द्रौपदी चीरहरण

दुर्योधन के मामा शकुनि पासे के खेल में माहिर थे। युधिष्ठिर को जुए का न्योता दिया गया, और शकुनि के छल भरे पासों से वे एक-एक करके अपना धन, राज्य, अपने भाई, स्वयं को और अंत में द्रौपदी को भी हार गए।

दुःशासन द्रौपदी को बालों से घसीटकर सभा में लाया। द्रौपदी ने सभा से प्रश्न किया कि जो स्वयं को हार चुका हो, वह पत्नी को दाँव पर कैसे लगा सकता है। भीष्म, द्रोण और बड़े-बड़े ज्ञानी चुप रहे। दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने उनका वस्त्र खींचना शुरू किया, पर वस्त्र खत्म ही नहीं हुआ। लोक परंपरा इसे द्रौपदी की पुकार पर श्रीकृष्ण की कृपा मानती है। उसी सभा में भीम ने दुःशासन का रक्त पीने और दुर्योधन की जंघा तोड़ने की प्रतिज्ञा ली।

धृतराष्ट्र ने डरकर पांडवों को सब कुछ लौटा दिया, पर दुर्योधन ने फिर से खेल रखवाया। इस बार शर्त थी कि हारने वाले 12 वर्ष वनवास और 1 वर्ष अज्ञातवास में रहेंगे, और अज्ञातवास में पहचाने गए तो फिर से 12 वर्ष। युधिष्ठिर फिर हारे।

वनवास और अज्ञातवास

वनवास में अर्जुन ने तपस्या करके किरात रूप में आए भगवान शिव से पाशुपतास्त्र पाया। एक सरोवर पर यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न पूछे, और उनके उत्तरों से प्रसन्न होकर उनके चारों भाइयों को जीवित किया। यही प्रसिद्ध यक्ष प्रश्न है।

तेरहवाँ वर्ष पांडवों ने राजा विराट के यहाँ भेष बदलकर बिताया: युधिष्ठिर कंक बने, भीम रसोइया बल्लव, अर्जुन नृत्य सिखाने वाली बृहन्नला, नकुल घोड़ों के और सहदेव गायों के रखवाले, और द्रौपदी सैरंध्री। यहाँ भीम ने द्रौपदी का अपमान करने वाले कीचक को मारा। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा से हुआ।

श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव

अज्ञातवास पूरा होने पर पांडवों ने अपना राज्य माँगा। युद्ध टालने के लिए श्रीकृष्ण स्वयं शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए और कहा कि पांडवों को केवल पाँच गाँव दे दो। दुर्योधन ने उत्तर दिया कि वह बिना युद्ध के सुई की नोक भर ज़मीन भी नहीं देगा। उसने कृष्ण को बंदी बनाने की कोशिश की, तब कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया।

लौटते समय कृष्ण ने कर्ण को बताया कि वह कुंती का सबसे बड़ा पुत्र है। कर्ण ने कहा कि जिसने उसे सम्मान दिया, उस दुर्योधन को वह नहीं छोड़ेगा। बाद में कुंती भी उनसे मिलीं, और कर्ण ने वचन दिया कि वह अर्जुन के सिवा किसी पांडव को नहीं मारेगा।

युद्ध से पहले अर्जुन और दुर्योधन दोनों कृष्ण से सहायता माँगने पहुँचे। कृष्ण ने कहा कि एक ओर उनकी नारायणी सेना होगी और दूसरी ओर वे स्वयं, बिना शस्त्र उठाए। अर्जुन ने कृष्ण को चुना, और दुर्योधन सेना पाकर खुश हो गया।

भगवद गीता: युद्ध से पहले का उपदेश

कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हुईं। अर्जुन ने सामने अपने पितामह, गुरु और भाइयों को देखा, तो उनका धनुष हाथ से छूट गया और उन्होंने लड़ने से मना कर दिया। तब सारथी बने श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद गीता का उपदेश दिया: कर्तव्य करो, फल की आसक्ति छोड़ो, आत्मा अमर है, और अपने धर्म से मत भागो। अर्जुन का मोह मिट गया।

यह पूरी बातचीत हस्तिनापुर के महल में बैठे संजय ने, व्यास जी से मिली दिव्य दृष्टि से देखकर, नेत्रहीन धृतराष्ट्र को सुनाई। गीता की सीखें विस्तार से पढ़ें: भगवद गीता की सात मुख्य सीखें।

कुरुक्षेत्र के 18 दिन

भीष्म (पहले 10 दिन): कौरव सेना के पहले सेनापति भीष्म थे, जिन्हें कोई हरा नहीं पा रहा था। भीष्म ने बताया कि वे शिखंडी पर शस्त्र नहीं उठाएँगे, जो पिछले जन्म में अम्बा थी। दसवें दिन अर्जुन ने शिखंडी को आगे रखकर बाणों की वर्षा की, और भीष्म बाणों की शय्या पर गिर पड़े। इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण वे उत्तरायण की प्रतीक्षा में जीवित रहे।

द्रोणाचार्य (11वें से 15वें दिन): तेरहवें दिन द्रोण ने चक्रव्यूह रचा। सोलह वर्ष के अभिमन्यु व्यूह में घुसना जानते थे, निकलना नहीं। जयद्रथ ने बाकी पांडवों को बाहर रोक लिया, और कई महारथियों ने मिलकर अकेले अभिमन्यु को मार दिया। पूरी कथा यहाँ पढ़ें: अभिमन्यु और चक्रव्यूह। अगले दिन अर्जुन ने सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध किया। उसी रात कर्ण ने इंद्र की दी हुई अमोघ शक्ति से घटोत्कच को मारा, वह शक्ति जो उसने अर्जुन के लिए बचा रखी थी।

द्रोण को रोकने के लिए भीम ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मारा, और युधिष्ठिर ने कहा, "अश्वत्थामा मारा गया, मनुष्य या हाथी।" आखिरी शब्द शंखनाद में दब गए। पुत्र की मृत्यु मानकर द्रोण ने शस्त्र रख दिए, और धृष्टद्युम्न ने उनका वध किया।

कर्ण (16वें और 17वें दिन): सोलहवें दिन भीम ने दुःशासन को मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। सत्रहवें दिन युद्ध के बीच कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँस गया। वह पहिया निकाल रहा था, तभी कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने उसका वध किया।

शल्य (18वाँ दिन): अंतिम दिन युधिष्ठिर ने शल्य को और सहदेव ने शकुनि को मारा। दुर्योधन एक सरोवर में छिप गया। बाहर आकर उसने भीम से गदा युद्ध किया, और भीम ने उसकी जंघा तोड़ दी।

उसी रात अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडव शिविर पर हमला किया और धृष्टद्युम्न, शिखंडी और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को मार डाला। उसने उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र चलाया, पर श्रीकृष्ण ने उस शिशु की रक्षा की। वही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित बना।

युद्ध के बाद: शोक, शिक्षा और स्वर्गारोहण

युद्ध जीतकर भी पांडवों ने सब कुछ खो दिया था। सौ पुत्र खो चुकी गांधारी ने श्रीकृष्ण को शाप दिया कि उनका यदुवंश भी आपस में लड़कर नष्ट होगा। कुंती ने पहली बार सबको बताया कि कर्ण उनका सबसे बड़ा पुत्र था, और युधिष्ठिर गहरे शोक में डूब गए।

युधिष्ठिर राजा बने। बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म ने उन्हें राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्ष धर्म की लंबी शिक्षा दी, और उत्तरायण आने पर देह त्यागी। कुछ वर्ष बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती वन चले गए और वहीं दावानल में उनका देहांत हुआ। छत्तीस वर्ष बाद गांधारी का शाप सच हुआ, यादव आपस में लड़ मरे, और एक शिकारी जरा का बाण लगने से श्रीकृष्ण ने देह त्यागी।

अंत में पांडवों ने परीक्षित को राज्य सौंपा और द्रौपदी के साथ हिमालय की ओर महाप्रस्थान किया। रास्ते में एक-एक करके सब गिरते गए। केवल युधिष्ठिर और उनके साथ चलता एक कुत्ता स्वर्ग के द्वार तक पहुँचे। युधिष्ठिर ने उस कुत्ते को छोड़कर स्वर्ग जाने से मना कर दिया, और तब पता चला कि वह स्वयं धर्मराज थे, जो उनकी परीक्षा ले रहे थे।

महाभारत की कहानी क्या है, एक पंक्ति में

महाभारत एक परिवार के झगड़े से कहीं बड़ी है। यह इस बारे में है कि जब लोभ, अहंकार और अन्याय को समय पर रोका नहीं जाता तो क्या होता है, और कठिन से कठिन समय में धर्म का रास्ता कैसे चुना जाए। इसीलिए कहा जाता है, "जो यहाँ है, वह और कहीं भी मिल सकता है; जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।"

महाभारत से क्या सीख मिलती है

  • चुप्पी भी फैसला है। द्यूत सभा में भीष्म और द्रोण जैसे ज्ञानी चुप रहे, और वही चुप्पी युद्ध तक ले गई।
  • ईर्ष्या अंधा कर देती है। दुर्योधन के पास सब कुछ था, पर पांडवों का सुख उससे देखा न गया।
  • वचन की कीमत होती है। भीष्म की प्रतिज्ञा और कर्ण की मित्रता दोनों महान थीं, पर दोनों ने उन्हें गलत पक्ष में खड़ा रखा। वचन निभाना और धर्म निभाना हमेशा एक बात नहीं होती।
  • कर्म करो, फल की चिंता छोड़ो। गीता की यह सीख आज की पढ़ाई, नौकरी और परिवार पर भी उतनी ही लागू होती है।
  • धर्म का रास्ता कठिन है, पर टिकता वही है। पांडवों ने भी गलतियाँ कीं और बहुत कुछ सहा, पर अंत में धर्म के साथ खड़े रहे।

महाभारत की कहानी वीडियो में देखें, एक-एक मिनट में

महाभारत इतनी बड़ी है कि एक बार में पूरी सुनना कठिन है। इसीलिए दिव्य कथा ऐप इसे लगभग एक-एक मिनट के छोटे हिंदी एपिसोड में सुनाता है, कई बार किसी पात्र की अपनी नज़र से, जैसे संजय या विदुर की नज़र से। दिव्य कथा ऐप में हर एपिसोड एक छोटी सीख लेकर आता है। रोज़ एक मिनट, और पूरी महाभारत आपकी अपनी हो जाएगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

महाभारत की कहानी क्या है?

महाभारत हस्तिनापुर के कुरु वंश के दो परिवारों, पांडवों और कौरवों, के बीच राज्य के अधिकार की कहानी है। छल से राज्य छिनने, 13 साल के वनवास और शांति के हर प्रयास के विफल होने के बाद कुरुक्षेत्र में 18 दिन का युद्ध होता है, जिसमें पांडव जीतते हैं। इसी युद्ध से पहले श्रीकृष्ण अर्जुन को भगवद गीता का उपदेश देते हैं।

महाभारत किसने लिखी?

महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। परंपरा के अनुसार व्यास बोलते गए और गणेश जी ने इसे लिखा, हालाँकि गणेश जी के लेखक होने का प्रसंग बाद की पांडुलिपियों में मिलता है। इसमें 18 पर्व हैं और इसे एक लाख श्लोकों का ग्रंथ कहा जाता है।

महाभारत का युद्ध कितने दिन चला?

कुरुक्षेत्र का युद्ध 18 दिन चला। कौरव सेना के सेनापति क्रम से भीष्म (10 दिन), द्रोणाचार्य (5 दिन), कर्ण (2 दिन) और शल्य (अंतिम दिन) थे।

महाभारत की कहानी कहाँ से शुरू होती है?

कथा के भीतर कुरु वंश की कहानी राजा शांतनु और गंगा के विवाह से शुरू होती है। उनके पुत्र देवव्रत ने पिता के सुख के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य और राजगद्दी त्यागने की प्रतिज्ञा ली और भीष्म कहलाए। यहीं से वह उलझन शुरू होती है जो आगे युद्ध तक ले जाती है।

महाभारत से क्या सीख मिलती है?

महाभारत सिखाती है कि लोभ, ईर्ष्या और अन्याय पर चुप रहना पूरे कुल को नष्ट कर सकता है, कि धर्म का रास्ता कठिन होते हुए भी अंत में वही टिकता है, और गीता के शब्दों में, कर्म करते रहो पर फल की आसक्ति छोड़ दो।

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