रामायण की कहानी अयोध्या के राजकुमार श्रीराम की कहानी है। पिता राजा दशरथ के वचन के कारण राम 14 वर्ष के लिए वन जाते हैं, वहाँ लंका का राजा रावण सीता का हरण कर लेता है, और राम हनुमान, सुग्रीव और वानर सेना की सहायता से समुद्र पर सेतु बनाकर रावण का वध करते हैं। सीता के साथ अयोध्या लौटने पर उनका राज्याभिषेक होता है, जिसे राम राज्य कहा जाता है।

मूल रामायण संस्कृत में महर्षि वाल्मीकि ने सात कांडों में लिखी। तुलसीदास का रामचरितमानस उसी कथा को अवधी में भक्ति भाव से कहता है। दोनों में कुछ प्रसंग अलग हैं, और नीचे जहाँ ऐसा है, वहाँ बताया गया है। यह रही रामायण की कहानी संक्षेप में, कांड दर कांड।
रामायण की कहानी: बालकांड
अयोध्या के राजा दशरथ की तीन रानियाँ थीं, कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा, पर कोई संतान नहीं थी। ऋषि ऋष्यशृंग ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया, और यज्ञ से मिली खीर रानियों में बाँटी गई। कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत, और सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
ऋषि विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए किशोर राम और लक्ष्मण को माँग ले गए। राम ने ताड़का और सुबाहु का वध किया और मारीच को बाण से दूर समुद्र किनारे फेंक दिया। रास्ते में राम ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार किया। (वाल्मीकि में अहिल्या शाप से अदृश्य होकर तप कर रही होती हैं; पत्थर बन जाने वाला रूप रामचरितमानस और बाद की कथाओं में मिलता है।)
मिथिला में राजा जनक ने प्रण किया था कि जो शिव के विशाल धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी से सीता का विवाह होगा। राम ने धनुष उठाया तो वह टूट गया। राम-सीता का विवाह हुआ, और साथ ही लक्ष्मण का उर्मिला से, भरत का मांडवी से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति से। धनुष टूटने पर परशुराम क्रोध में आए; मानस में यह प्रसंग स्वयंवर सभा में ही होता है, जबकि वाल्मीकि में वे अयोध्या लौटते समय रास्ते में मिलते हैं।
अयोध्याकांड: राम वनवास
दशरथ ने राम को युवराज बनाने का निश्चय किया। तब कैकेयी की दासी मंथरा ने कैकेयी के मन में संदेह भरा। कैकेयी ने दशरथ से वे दो वरदान माँगे जो उन्होंने युद्ध में उनकी प्राण रक्षा के बदले देने का वचन दिया था: भरत को राजगद्दी, और राम को 14 वर्ष का वनवास।
राम ने बिना शिकायत पिता का वचन माना। सीता और लक्ष्मण भी साथ चल पड़े। गंगा किनारे निषादराज गुह ने उनका स्वागत किया, और वे चित्रकूट पहुँचे। पुत्र वियोग में दशरथ ने प्राण त्याग दिए। मरते समय उन्हें युवावस्था की वह भूल याद आई जब उनके बाण से एक युवा तपस्वी की मृत्यु हुई थी, जो अपने अंधे माता-पिता के लिए पानी भर रहा था। लोक परंपरा में यह बालक श्रवण कुमार के नाम से जाना जाता है।
ननिहाल से लौटे भरत ने राजगद्दी लेने से मना कर दिया और राम को लौटाने चित्रकूट गए। राम पिता के वचन से पीछे नहीं हटे। तब भरत उनकी चरण पादुका सिर पर रखकर लौटे, उन्हें सिंहासन पर रखा, और स्वयं नंदीग्राम में तपस्वी की तरह रहकर राम के नाम से राज चलाया।
अरण्यकांड: सीता हरण
वन में राम, सीता और लक्ष्मण ने अत्रि-अनसूया जैसे ऋषियों के आश्रम देखे और अंत में पंचवटी में कुटिया बनाई। वहाँ रावण की बहन शूर्पणखा राम पर मोहित हुई, और ठुकराए जाने पर सीता पर झपटी। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। बदला लेने आए खर और दूषण की पूरी सेना को राम ने अकेले नष्ट कर दिया।
तब रावण ने मारीच को सोने का हिरण बनाकर भेजा। सीता के कहने पर राम उसके पीछे गए। मरते हुए मारीच ने राम की आवाज़ में "हा लक्ष्मण!" पुकारा। सीता के आग्रह पर लक्ष्मण भी चले गए। वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण रेखा का उल्लेख नहीं है; यह बाद की परंपरा से आई है, और रामचरितमानस के लंकाकांड में मंदोदरी इसका केवल एक संक्षिप्त उल्लेख करती है।
साधु के वेश में आए रावण ने सीता का हरण कर लिया और आकाश मार्ग से लंका की ओर चला। वृद्ध गिद्धराज जटायु ने उसे रोका और लड़ते हुए घायल होकर गिर पड़े। राम के आने पर उन्होंने बताया कि रावण सीता को दक्षिण की ओर ले गया है, और प्राण त्याग दिए। आगे राम भक्त शबरी से मिले, जिसने बरसों उनकी प्रतीक्षा की थी। (शबरी के चखे हुए जूठे बेर का प्रसंग वाल्मीकि में नहीं, बाद की भक्ति परंपरा में मिलता है।)
किष्किंधाकांड: हनुमान और सुग्रीव
ऋष्यमूक पर्वत पर वानरराज सुग्रीव अपने भाई बाली के डर से छिपे थे। उनके मंत्री हनुमान ब्राह्मण के वेश में राम से मिले, और यहीं राम और हनुमान का अटूट संबंध शुरू हुआ। राम और सुग्रीव ने अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता की। राम ने बाली का वध किया और सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया।
वर्षा ऋतु के बाद सुग्रीव ने सीता की खोज में चारों दिशाओं में वानर भेजे। दक्षिण वाले दल में अंगद, जाम्बवान और हनुमान थे। समुद्र किनारे जटायु के भाई संपाती ने बताया कि सीता सौ योजन दूर लंका में हैं। समुद्र कौन लांघे? तब जाम्बवान ने हनुमान को उनकी भूली हुई शक्ति याद दिलाई।
सुंदरकांड: हनुमान लंका में
हनुमान ने समुद्र लांघा, रास्ते में सुरसा की परीक्षा पास की और सिंहिका को मारा। लंका में उन्होंने अशोक वाटिका में शोक में डूबी सीता को खोज निकाला, राम की मुद्रिका दी और निशानी के रूप में सीता की चूड़ामणि ली। फिर उन्होंने वाटिका उजाड़ी, रावण के पुत्र अक्षय कुमार को मारा, और मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से स्वयं बंधकर रावण के दरबार में पहुँचे। उनकी पूँछ में आग लगाई गई, तो उन्होंने उसी से लंका दहन कर दिया और लौटकर राम को सीता का समाचार दिया। विस्तार से पढ़ें: सुंदरकांड में हनुमान की कथा और सीख।
युद्धकांड (लंकाकांड): राम-रावण युद्ध
रावण के भाई विभीषण ने उसे सीता लौटाने की सलाह दी, तो रावण ने उन्हें अपमानित करके निकाल दिया। विभीषण राम की शरण में आए। वानर नल के नेतृत्व में वानर सेना ने समुद्र पर राम सेतु बनाया, और सेना लंका पहुँची। मानस में युद्ध से पहले अंगद दूत बनकर रावण की सभा में जाते हैं और अपना पैर जमा देते हैं, जिसे कोई हिला नहीं पाता।
युद्ध में कुंभकर्ण राम के हाथों मारा गया। मेघनाद के अस्त्र से लक्ष्मण मूर्छित हुए, तो हनुमान हिमालय से संजीवनी बूटी वाला पूरा पर्वत ही उठा लाए। लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया। अंत में राम और रावण का भीषण युद्ध हुआ। वाल्मीकि में अगस्त्य मुनि राम को आदित्य हृदय स्तोत्र देते हैं और राम ब्रह्मास्त्र से रावण का वध करते हैं; मानस में विभीषण बताते हैं कि रावण की नाभि में अमृत है, और राम का बाण वहीं लगता है।
युद्ध के बाद सीता ने अग्नि परीक्षा दी, और अग्नि देव ने स्वयं उन्हें सुरक्षित लौटाया। (मानस में असली सीता हरण से पहले ही अग्नि में रख दी गई थीं, और रावण ने उनकी छाया का हरण किया था।) विभीषण लंका के राजा बने, और राम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे, जहाँ उनका राज्याभिषेक हुआ। लोक परंपरा में राम के इसी लौटने की खुशी में दीपावली मनाई जाती है।
उत्तरकांड: राम राज्य और उसके बाद
राम राज्य में प्रजा सुखी और धर्मपरायण थी। वाल्मीकि के उत्तरकांड में आगे की कथा कठिन है: प्रजा में उठी बातों के कारण राम ने गर्भवती सीता का त्याग किया। सीता वाल्मीकि के आश्रम में रहीं, जहाँ लव और कुश का जन्म हुआ। वर्षों बाद राम के अश्वमेध यज्ञ में दोनों बालकों ने रामायण गाकर सुनाई। सीता से फिर शपथ माँगी गई, तो उन्होंने धरती माता से प्रार्थना की और धरती में समा गईं। अंत में राम सरयू में प्रवेश करके अपने धाम गए।
रामचरितमानस के उत्तरकांड में सीता त्याग का प्रसंग नहीं है; वहाँ राम राज्य का वर्णन और काकभुशुंडि-गरुड़ संवाद में भक्ति की महिमा है। कई विद्वान वाल्मीकि के उत्तरकांड को बाद में जोड़ा गया भाग मानते हैं।
रामायण की कहानी हिंदी में: मुख्य पात्र एक नज़र में
| पात्र | कौन | किस बात के लिए याद किए जाते हैं |
|---|---|---|
| श्रीराम | अयोध्या के राजकुमार, विष्णु के अवतार | मर्यादा, वचन पालन |
| सीता | जनक की पुत्री, राम की पत्नी | धैर्य, साहस |
| लक्ष्मण | राम के छोटे भाई | सेवा, समर्पण |
| भरत | कैकेयी के पुत्र | त्याग, भाई के प्रति प्रेम |
| हनुमान | सुग्रीव के मंत्री, राम भक्त | भक्ति, शक्ति, विनम्रता |
| रावण | लंका का राजा | ज्ञान के बावजूद अहंकार |
| विभीषण | रावण के भाई | सत्य के पक्ष में खड़ा होना |
रामायण से क्या सीख मिलती है
- वचन निभाना सुख से बड़ा है। राम ने राजगद्दी छोड़ दी, पर पिता का वचन नहीं टूटने दिया।
- सच्चा भाई कैसा हो। लक्ष्मण साथ चले, भरत ने मिला हुआ राज्य भी नहीं लिया।
- छोटे-बड़े सब मिलकर बड़ा काम करते हैं। वानर, भालू, एक वृद्ध गिद्ध और एक वनवासी भक्त, सबने राम का साथ दिया।
- अहंकार ज्ञान को भी डुबो देता है। रावण महाज्ञानी था, पर अहंकार ने उसका सब कुछ छीन लिया।
- सही के साथ खड़ा होना पड़ता है। विभीषण ने अपना घर छोड़ा, पर सत्य नहीं छोड़ा।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
रामायण की कहानी संक्षेप में क्या है?
अयोध्या के राजकुमार श्रीराम को पिता के वचन के कारण 14 वर्ष का वनवास मिलता है। वन में लंका का राजा रावण सीता का हरण कर लेता है। राम हनुमान, सुग्रीव और वानर सेना की सहायता से समुद्र पर सेतु बनाकर लंका पहुँचते हैं, रावण का वध करते हैं और सीता को लेकर अयोध्या लौटते हैं, जहाँ उनका राज्याभिषेक होता है।
रामायण में कितने कांड हैं?
वाल्मीकि रामायण में सात कांड हैं - बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, युद्धकांड और उत्तरकांड। तुलसीदास के रामचरितमानस में भी सात कांड हैं, जहाँ युद्धकांड को लंकाकांड कहा गया है।
क्या लक्ष्मण रेखा वाल्मीकि रामायण में है?
नहीं। वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण रेखा का उल्लेख नहीं है। यह बाद की परंपराओं से आई है; रामचरितमानस के लंकाकांड में मंदोदरी इसका केवल एक संक्षिप्त उल्लेख करती है, और आज की लोकप्रिय छवि लोक कथाओं और धारावाहिकों से बनी है।
रामायण किसने लिखी?
संस्कृत में मूल रामायण महर्षि वाल्मीकि ने लिखी, जिन्हें आदिकवि कहा जाता है। सोलहवीं सदी में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस लिखा, जो उत्तर भारत में घर-घर पढ़ा जाता है।
रामायण से क्या सीख मिलती है?
रामायण सिखाती है कि वचन और कर्तव्य निभाना सुख से बड़ा है, कि सच्चे भाई, मित्र और सेवक कैसे होते हैं, और कि अहंकार कितना भी शक्तिशाली हो, अंत में धर्म ही जीतता है।
